"कौलान्तक संप्रदाय" योगिनी शक्तियों की उपासना को प्रमुखता देता है। चौंसठ योगिनी ही कलियुग में सशरीर दर्शन देने में समर्थ मानी जाती हैं। चौंसठ योगिनी मंडल में सत्व, रज, तम तीनों गुण विद्यमान होते हैं, किन्तु इनकी साधना को राजसी रीति से संपन्न करना ही श्रेष्ठ कहा गया है। योगिनियों को साध लेने वाला कभी भी अकेला नहीं होता। योगिनियाँ साधक को स्वयं ज्ञान देती हैं। भोग में प्रवृत्ति भी इनका ही गुण है। अक्सर ये पूछा जाता है की साधू-सन्यासियों के पास इतना पैसा कहाँ से आता है? वो महँगी गाड़ियों आश्रमों में राजसी तरीकों से कैसे रहते हैं। इसके पीछे कारण हैं योगिनी शक्तियों की साधना और आराधना। इसी कारण योगिनियों को भारतीय कर्मकांड सहित तंत्र नें अपनी पूजा उपासना में बड़ा अहम् स्थान प्रदान किया है। "कौलान्तक संप्रदाय प्रमुख" ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" संक्षेप में ये कहते हैं की इन चौंसठ योगिनियों का सिद्ध होना ही चौंसठ कलाओं को हस्तगत करने का उपाय है।
वामेश्वरी कुरुकुल्ला वाम मंत्र
प्रस्तुत है 'कौलान्तक पीठ' की प्रमुख अधिष्ठात्री शक्ति 'देवी कुरुकुल्ला' का वाम मंत्र। ये मंत्र 'वामेश्वरी मंत्र' के नाम से भी जाना जाता है। चमत्कारों और जादु की देवी का विकराल मुख ही 'कुरुकुल्ला' है। देवी 'कुरुकुल्ला' जिन्हें 'रक्त तारा' कहा जाता है। वाममार्ग की भी प्रमुख आराध्या शक्ति हैं। उनका एक 'वाम मंत्र' साधक को अद्भुत विचार और सामर्थ्य प्रदान करता है। 'कौल' साधकों का ये गोपनीय मंत्र यहाँ स्वयं 'ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ' प्रकट कर रहे हैं। हालाँकि इसे गोपनीय ही रखा जाता है। लेकिन 'कौलान्तक पीठ' के प्रमुख होने के नाते ये उनके अधिकार क्षेत्र में आता है। ये मंत्र 'ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ' द्वारा गाया गया है । तो प्रस्तुत है 'कौल क्रमानुसार' देवी का ये दुर्लभ मंत्र- ।। वामेश्वरी कुरुकुल्ला वाम मंत्र ।। ।। ॐ झां झां झां हां हां हां हें हें हें कौलिनी कामिनी द्राविणी प्रिये कुरुकुल्ले स्वाहा ।। (मंत्र के लिए गुरु से आज्ञा और दीक्षा अवश्य प्राप्त करें, ध्यान रहे ये वाममार्ग...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें