इसलिए अंतर इन सभी बाबाओं के तरीकों में हो सकता है, लेकिन इनके उद्देश्यों में नहीं और उद्देश्य समान ही है- शराब-जुए, नशों और अय्याशी में खर्च होने वाले पैसों का धर्म, मंदिर, संस्कृति व धार्मिकों के लिए प्रयोग करना। साथ ही इस समाज में मूर्ख, अश्लील, अपराधी-माफिया, उगाही-बसूली वाले 'प्रसिद्धि' हासिल कर उसका दुर्पयोग करते हैं। इसलिए इन बाबाओं को प्रसिद्धि दी जाती है ताकि उस प्रसिद्धि का प्रयोग अधर्मी, नास्तिक व मलेच्छ ना कर सकें। प्राचीन काल से ही #गुरु बनाने की परम्परा चल रही है। धर्मानुसार व ग्रंथानुसार ये कहा गया है कि गुरु बिन मोक्ष नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं, गुरु ईश्वर से बढ़कर है, गुरु की शरण में आओ, गुरु साक्षात भगवान है और इसका उदहारण गुरु गीता आदि अनेक ग्रंथों व आगम-निगम में निहित है। जहाँ इस महत्त्व को स्वयं शिव ने बताया है। ग्रंथों के इन् श्लोको को आप स्वयं देख लीजिये:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
अर्थात् गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है। उन सद्गुरु को प्रणाम है।
अखण्ड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
जो अखण्ड है, सकल ब्रह्माण्ड में समाया है, चर-अचर में तरंगित है। उस (प्रभु) के तत्व रूप को जो मेरे भीतर प्रकट कर मुझे साक्षात दर्शन करा दे, उन गुरु को मेरा शत् शत् नमन है। अर्थात् वही पूर्ण गुरु है ।
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
अर्थात् अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे हुए जीव की आँखें जिसने ज्ञानरूपी काजल की श्लाका से खोली हैं, ऐसे श्री सदगुरू को नमन है, प्रणाम है।
नमोस्तु गुरुवे तस्मै, इष्टदेव स्वरूपिणे।
यस्य वाग्मृतम् हन्ति,विषं संसार संज्ञकम्।।
अर्थात् उन गुरूदेव रूपी इष्टदेव को वन्दन है, जिसकी अमृत वाणी अज्ञानता रूपी विष को नष्ट कर देती है।
निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते।
गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते॥
अर्थात् जो दूसरों को प्रमाद करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप मार्ग पर चलते हैं। हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध कराते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं।
नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसंनिधौ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत्॥
अर्थात् गुरु के पास हमेशा उनसे छोटे आसन पे बैठना चाहिए । गुरु आते हुए दिखे, तब अपनी मनमानी से नहीं बैठना चाहिए ।
किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च।
दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम्॥
अर्थात् बहुत कहने से क्या? करोडों शास्त्रों से भी क्या? चित्त की परम् शांति, गुरु के बिना मिलना दुर्लभ है ।
गुकारस्त्वन्धकारस्तु रुकार स्तेज उच्यते।
अन्धकार निरोधत्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥
अर्थात् ‘गु’कार याने अंधकार, और ‘रु’कार याने तेज। जो अंधकार का (ज्ञान का प्रकाश देकर) निरोध करता है, वही गुरु कहा जाता है।
शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च।
नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्॥
अर्थात् शरीर, वाणी, बुद्धि, इंद्रिय और मन को संयम में रखकर, हाथ जोडकर गुरु के सन्मुख देखना चाहिए ।
देवो रुष्टे गुरुस्त्राता गुरो रुष्टे न कश्चन:।
गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता गुरुस्त्राता न संशयः।।
अर्थात् – भाग्य रूठ जाने पर गुरू रक्षा करता है। गुरू रूठ जाये तो कोई रक्षक नहीं होता। गुरू ही रक्षक है, गुरू ही शिक्षक है, इसमें कोई संदेह नहीं।
।। ऊं श्री गुरवे नमः ।।
ये सब ग्रन्थ आज नहीं लिखे गए, वर्षों से हिन्दू समाज में प्रचलित हैं और धर्म को मानने की स्वतंत्रता आधुनिक भारत का संविधान भी देता है।
आपको भारत में अक्सर 'गुरु बिना दुनिया अंधेरी जैसे गीत सुनाई देते होंगे'। किसने लिखे ये गीत? ये किसी प्रेमी भक्त के शब्द हैं, जो ह्रदय और उसके भावो को जानता है। जो धर्म, गुरु, सनातन संस्कार, और नश्वर जीवन के सार को जानता है। लेकिन मलेच्छों को ये भजन तीर की तरह चुभते हैं, सीने में आग लग जाती है उनके, आप पूछेंगे क्यों? कारण है उनकी मलेच्छता? बेचारे माता-पिता प्रेम विहीन, गुरु, संस्कृति, संस्कार विहीन, दया के पात्र, कुबुद्धि, मनोबंधयुक्त, पापी सत्य क्या जानें? उनको तो बस 'कामानन्द' बनाना है यक्ष बनाना है, नास्तिक बनाना है या स्वयं को तर्कशील दिखाना है ताकि हिन्दू धर्म से, हिन्दू संस्कृति से, या किसी हिन्दू धर्म गुरु से शत्रुता निकाली जा सके।
आपने मलेच्छों को और उनके संगठनों को अक्सर कहते हुए सुना होगा, कि बहुत से गुरु भभूत निकालते है ,चमत्कार करते हैं। एक-एक गुरु ने लाखों की संख्या में चेले पाल रखे हैं। ये एक अजीब परम्परा शुरू हुई है। हा हा हा हा हा............ गुरु जो भभूत निकालते हैं दरासल वो नास्तिक, मलेच्छों की लेने का तरीका भर है। गुरु या ईश्वर की कृपा भाव मात्र से मिल जाती है। पर जान बूझ कर गुरु ऐसा करते हैं। क्योंकि केवल धर्म प्रचार से संस्कृति और सनातन नहीं बचेगा! बल्कि सनातन के शत्रुओं, नास्तिकों और मलेच्छों की अच्छे से लेनी होगी। ये युद्ध है इसलिए भभूत के नाम पर नास्तिक, मलेच्छों के पिछवाड़े से भभूत निकलती है। इसलिए हिन्दू गुरुओं की रणनीति को ठीक से समझें। कामानंदियों, यक्ष छाप बाबाओं, नास्तिकों के चक्कर में न पड़ें। चमत्कार करें व और ज्यादा करें, तब तक करें, जब तक ये सब समूल नष्ट न हो जाएँ। इनके स्थान विशेष से भभूत गिराने न लगे। इस ख़ुशी में बोलो जय माँ धूमावती! जय-जय माँ धूमावती!
गुरुओं को लाखों नहीं करोड़ों की संख्या में चेले पालने चाहिए, ताकि देश नास्तिकों और मलेच्छों के हाथ में न जाए। इसलिए विचार युद्ध से हिन्दुओं को अब पीछे नहीं हटना चाहिए। ये नई परंपरा हिन्दुओं की शान है और एक जबरदस्त रणनीति भी। ये देश हिन्दुओं का था है और रहेगा भी। आगे पूरा विश्व भी हिन्दू हो ही जायेगा, इसलिए असली गुरुओं को पहचानो, और बाबा आनंद गुप्ता उर्फ़ यक्ष बाबा उर्फ़ कामानन्द बाबा जैसे लोगों को सबक सिखाइये।
आईए इन गुरु विरोधियों, धर्म विरोधियों, मलेच्छ-नास्तिकों का सफाया करें और इनको आज़ादी दें। क्योंकि ये ले के रहेंगे आज़ादी और हम दे के रहेंगे आज़ादी।
जय अखंड भारतवर्ष!
#पेलनाजरूरीहै #यक्षमर्दक
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