हे योगी, एक अनुभव सागर की अद्भुत स्थिति है जिसे तुम्हे मृत्यु से पूर्व अवश्य जन लेना चाहिए. वो स्थिति पूर्णता का पूर्ण सागर है. वो स्थिति ही उत्पत्ति और अंत को धारण करनेवाली है, जिसे न देखा जा सकता है, न सुना, न ही ग्रहण किया जा सकता है और न ही अभिव्यक्त. जो मन, इंद्रियों व बुद्धि से परे अजन्मा है, नित्य है और चैतन्य प्रकृति से भी पार है. जिसे केवल विवेकी आत्म जागरण कर महासमाधि की स्थिति में ही अनुभव करता है. वो कोई दृश्य नहीं, न ही वो अदृश्य है, न ही किसी दृश्य से भिन्न ही. वहां न तो तुम्हारी भावनाएं, न तुम्हारी धारणाएं, न तुम्हारे विचार, बुद्धि और न ही ये वर्तमान चेतना है; वहां न कोई कर्म है और न कार्य; न जीवन, न मृत्यु ही है; वहां कोई रूप, स्वरूप अथवा रूप रहित नहीं; कोई प्रारंभ या कोई अंत भी नहीं; वहां कोई शुद्धि, अशुद्धि, ज्ञान, अज्ञान, पवित्रता और अपवित्रता भी नहीं. न तो वहां कोई बढ़ता है और न ही कम होता है इसलिए वहां कुछ साधने जैसा भी है ही नहीं, क्योंकि वो द्वंद्वों से पार है. वो पंच कर्मेंद्रियरहित अवस्था है; स्वाद, गंध, स्पर्श, रूप और ध्वनि नाद से परे. न ही वहां बालावस्था, यौवन और वृद्धावस्था है और न ही मृत्यु और न ही इनसे परे की कोई स्थिति; इसलिए वहां कोई दुःख, पाप, शंका नहीं और न ही उनकी उत्पत्ति के कोई कारण. वहां का कोई मार्ग भी नहीं और न ही उसे पाने का कोई पुरातन गोपनीय ज्ञान. वो प्राप्ति अथवा अप्राप्त से परे है; अनुभूति और ज्ञान की अद्भुत अकथनीय पूर्णता है. वहां हृदय में कोई दुविधा, संदेह अथवा भाव स्पंदन नहीं; अतः कोई भय भी नहीं. छल, प्रपंच और माया से पार वो महा पूर्ण स्थिति है इसलिए पूर्णता की उस अद्भुत स्थिति को अपने भीतर प्रकाशित होने दे, क्योंकि वही एक पाने योग्य स्थिति है।
- महासिद्ध ईशपुत्र
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